लखनऊ नगर में पाइप द्वारा जलापूर्ति वर्ष 1892-93 में प्रारम्भ की गयी जबकि नगर की जनसंख्या लगभग 2 लाख थी, प्रारम्भ में मात्र 2 स्लो सैण्ड फिल्टरों का निर्माण किया गया था जिनकी प्रति फिल्टर शोधन क्षमता 2 एम0एल0डी0 (कुल 4 एम0एल0डी0) थी। उस समय वाष्प चालित पंपिग प्लाण्ट अधिष्ठापित थे जो गोमती नदी से रॉ-वाटर ऐशबाग ट्रीटमेन्ट वर्क्स पर लाते थे। कालान्तर में विद्युत आपूर्ति उपलब्ध हो जाने के बाद विद्युत चालित प्लान्ट लगाये गये। शनैः शनैः नगर की बढ़ती हुई आबादी से बढ़ी पेयजल की मॉग को देखते हुए गऊघाट स्थित रॉ-वाटर पंपिंग स्टेशन की क्षमता बढ़ायी गयी और इसी के साथ जल शोधन क्षमता में भी वृद्धि की  गयी। वर्ष 1892-93 से लेकर 1930 तक जल शोधन मात्रा स्लो सैण्ड फिल्टर के माध्यम से होता था जिनकी सम्भावित क्षमता 45 एम0एल0डी0 की जा चूकी थी । बढ़ती हुई मॉग को पूरा करने के लिए 1935 एवं 1945 में क्रमशः 13.5 एम0एल0डी0 क्षमता के रैपिड गे्रविटी फिल्टर प्लान्ट (पैटरसन) का निर्माण किया गया। इसी प्रकार 54 एम0एल0डी0 की क्षमता का कैन्डी रैपिड गे्रविटी फिल्टर प्लान्ट वर्ष 1957 एव 45 एम0एल0डी0 के वर्ड रैपिड फिल्टर प्लान्ट का निर्माण वर्ष 1975 तक आते-आते जलकल, ऐशबाग की कुल शोधन क्षमता 172 एम0एल0डी0 हो गयी। जल शोधन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ रॉ-वाटर पंपिंग एवं स्वच्छ जल पंपिंग प्लान्ट की अधिष्ठापित क्षमता में भी वृद्धि वर्ष 1924, 1940 एवं 1956 में की गयी तथा वर्तमान में रॉ-वाटर पंपिंग की अधिष्ठापित क्षमता 70500 गैलन प्रति मिनट (297 एच0पी0) तक पहुँच गयी है एवं स्वच्छ जल पंपिंग अधिष्ठापित क्षमता 71000 गैलन प्रति मिनट (2611 एच0पी0) तक पहुँच गयी है।

नगर की पेयजल व्यवस्था को वर्ष 1976 से विश्व बैंक सहायता से पुर्नगठित किया गया। विश्व बैंक के सब प्रोजक्ट प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय जिनकी लागत क्रमशः 310 लाख, 490 लाख एवं 805 लाख थी जो कि क्रमशः 1976, 1978 एवं 1980 में लागू किये गये थे, के द्वारा नगर के विभिन्न क्षेत्रों में 12 नलकूप, 7 जोनल पंपिंग स्टेशन, अवर जलाशयों का निर्माण तथा लगभग 500 कि0मी0 जल वितरण नालिकाओं का विस्तार कर जन आकॉक्षाओं के अनुरूप बनाने का प्रयास किया गया। नलकूपों का निर्माण त्वरित राहत देने के उद्देश्य से किया गया, क्योकि बड़ी-बड़ी योजनाओं के लिए आर्थिक सहायता के अभाव में और कोई विकल्प नहीं था। लखनऊ का भूमिगत जल श्रोत सन्तोषप्रद नही है, तथा नलकूपों से कम पानी मिलता हैं।

वर्ष 94-95 में बालागंज द्वितीय, जलकल का निर्माण कर उत्पादन प्रारम्भ किया गया। वर्तमान में द्वितीय जलकल बालागंज से लगभग 770 एम0एल0डी0 जल का उत्पादन किया जा रहा है। वर्ष 2000 से 2002 के मय केन्द्रीय भूगर्भ जल परिषद के सहयोग से नगर में 25 अदद नलकपों की बोरिंग करायी है। नगर में वर्तमान में 352 नलकूप स्थापित हैं। नगर के पुराने क्षेत्रों में काफी पुराने हुए जीर्ण शीर्ण अवस्था में पड़े हुए थे। (राज्य नगरीय विकास प्राधिकरण) सूडा के सहयोग से इन जीर्ण-शीर्ण इन्दारा कुओं में बोरिंग कर पम्प लगाकर क्षेत्रीय जलापूर्ति में सुधार किया गया है। वर्तमान में 55 इन्दारा कुऑ स्थापित हैं।

लखनऊ जल संस्थान लखनऊ वासियो को प्रमुख रूप से गोमती नदी के जल की ही आपूर्ति करता है जो कि इसका मुख्य श्रोत है इसके अतिरिक्त लखनऊ महानगर मे 350 से अधिक नलकूप अधिष्ठापित है।

आज लखनऊ जल संस्थान की सेवाओं से लगभग 30 लाख व्यक्ति लाभान्वित है। जिनको संस्थान निम्न प्रकार से सेवाए प्रदान कर रहा हैः-

 

1.

ऐशबाग जलकल के माध्यम से    

172 एम0एल0डी0 प्रतिदिन

2.

बालागंज जलकल के माध्यम से

70 एम0एल0डी0 प्रतिदिन

3.

नलकूप (352 से अधिक) के माध्यम से

185 एम0एल0डी0 प्रतिदिन

4.

5000 इण्डिया मार्का हैण्डपम्प के माध्यम से

25  एम0एल0डी0 प्रतिदिन

5.

55 इन्दारा कुऑं के माध्यम से

28 एम0एल0डी0 प्रतिदिन

 

लखनऊ महानगर की जलापूर्ति सुदृढ़ीकरण हेतु विभिन्न प्रयास किये गये जैसे नये उच्च जलाशयों का निर्माण एवं निर्माण, नये नलकूपो के निर्माण, रीबोरिंग तथा जल आपूर्ति पाइप लाइन का विस्तार मुख्य रूप से है। ऐशबाग एवं बालागंज जलकल के माध्यम से लखनऊ के 10 से अधिक विभिन्न क्षेत्रों के पम्पिंग स्टेशनों को भरकर उच्च चाप पर जलापूर्ति की जा रही है।

खुदा का पैगाम है जल, ईश्वर का वरदान है जल, जल ही जीवन है।

जल का संरक्षण हमारा धर्म है, जल का अपव्यय रोकना हमारा कर्तव्य है॥

 

जल के महत्व को महान कवि रहीम ने लिखा हैः-

रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून,
पानी गये न उबरे मोती मानुष चून।

 

सीवर सम्बन्धी

 

लखनऊ महानगर के लगभग 40 प्रतिशत क्षेत्रों में ही सीवर लाइन की व्यवस्था कराई जा सकी है। इसमें लगभग 37000 मैनहोल के माध्यम से 410 कि0मी0 में सीवर लाइन स्थापित है। इसको बिना अवरूद्ध हुए चलाने के लिए जनता की कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए सीवर की सफाई करवाने के लिए 3 सीवर जेटिंग मशीन की व्यवस्था की गयी है। एवं समय - समय पर उत्तर प्रदेश जल निगम के माध्यम से सीवेज पम्पिंग स्टेशनों का जीर्णोद्वार होता रहता है।

 

गोमती नदी के प्रदूषण को कम करने के लिए गोमती कार्य योजना के अर्न्तगत नगरिया नाले के उत्प्रवाह को मोड़कर सरकटा नाले में जोड़ने का कार्य किया जा रहा है। जिससे गऊघाट इनटेक चैनल पर नगरिया नाले से होने वाले प्रदूषण को समाप्त किया जा सके। पाटानाला व सरकटा नाला के उत्प्रवाह को ट्रंक सीवर में परिवर्तित कर दौलतगंज में मोहनी पुरवा के सज्जादबाग में सीवर शोधन संयन्त्रों की स्थापना की जा रही है। यह कार्य उत्तर प्रदेश जल निगम के माध्यम से किया जा रहा है।

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